प्रेम एक राग है या कोई रंग है,
या डस गया जो हर किसी को ये कोई भुजंग है।
कोई कहता मृदंग है कोई कहता निषंग है
पर हर हृदय की हर गली में चलता प्रेम का प्रसंग है।
कहीं ये आश तो कहीं विश्वास है,
कहीं उपवास तो कहीं मधुमास है।
कहीं विलयन तो कहीं मिलाप प्रेम वो तरंग है,
पर हर हृदय की हर गली में चलता प्रेम का प्रसंग है।
कभी ये सुख का सागर कभी अंधकार है,
कभी ये रक्षा कवच तो कभी प्रहार है।
कभी ये मोह बंधन तो कभी मलंग है,
पर हर हृदय की हर गली में चलता प्रेम का प्रसंग है।
कोई इसे सर्वस्व कहता कोई कहता निराधार है,
कोई इसे कलंक कहता कोई कहता श्रिंगार है।
कोई कहता उन्माद है कोई कहता उमंग है,
पर हर हृदय की हर गली में चलता प्रेम का प्रसंग है।
क्या ये प्रेम एक रोग है?
क्या ये भोग है या कोई योग है?
करता इसके दोहरे चरित्र से न हर कोई दंग हैं?
पर हर हृदय की हर गली में चलता प्रेम का प्रसंग है।
ये हैं मन का प्रबल प्रवाह या शितल हिम सघन है?
विस्मृत करता है पल पल जो माया है या चेतन है?
कभी है सिंधु का ज्वार भाट कभी है स्थिर पर्वत समान।
क्या बनता ये सप्तरंग सुमन या बनता है सकरुण अवसान ?